Tuesday, October 30, 2018

होमी जहाँगीर भाभा ना होते तो कैसा होता भारत?

अक्सर डबल ब्रेस्ट सूट पहनने वाले भाभा की वैज्ञानिक विषयों के साथ-साथ संगीत, नृत्य, पुस्तकों और चित्रकला में बराबर की रुचि थी. वैज्ञानिकों को भाषण देते हुए तो आपने देखा होगा लेकिन अपने साथियों का पोर्ट्रेट या स्केच बनाते हुए शायद नहीं.

आर्काइवल रिसोर्सेज़ फ़ॉर कंटेम्परेरी हिस्ट्री की संस्थापक और भाभा पर किताब लिखने वाली इंदिरा चौधरी कहती हैं, "मृणालिनी साराबाई ने मुझे बताया था कि भाभा ने उनके दो स्केच बनाए थे. यहां तक कि हुसैन का भी स्केच भाभा ने बनाया था.''

''जब हुसैन की पहली प्रदर्शनी मुम्बई में हुई थी तो भाभा ने ही उसका उद्घाटन किया था. जब भी बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स की प्रदर्शनी होती थी तो भाभा ज़रूर आते थे और वहां से अपनी संस्था के लिए पेंटिंग्स और मूर्तियां ख़रीदते थे."

संगीत प्रेमी
जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर यशपाल ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में अपने करियर के शुरू के दिनों में होमी भाभा के साथ काम किया था. उन्होंने कहा था कि 57 साल की छोटी सी उम्र में भाभा ने जितना कुछ हासिल किया, उसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता.

यशपाल ने बताया था, "संगीत में उनकी बहुत रुचि थी... चाहे वो भारतीय संगीत हो या पश्चिमी शास्त्रीय संगीत. किस पेंटिंग को कहां टांगा जाए और कैसे टांगा जाए.. फ़र्नीचर कैसा बनना है.. हर चीज़ के बारे में बहुत गहराई से वह सोचते थे. टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च में हर बुधवार को एकेडमिक कॉन्फ्रेंस होती थी और भाभा ने शायद ही कोई कोलोकियम (एकेडमिक कॉन्फ्रेंस) मिस किया हो. इस दौरान वह सबसे मिलते थे और जानने की कोशिश करते थे कि क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है."

होमी भाभा जवाहरलाल नेहरू के काफ़ी नज़दीक थे और दुनिया के उन चुनिंदा लोगों में से थे जो उन्हें भाई कहकर पुकारते थे.

इंदिरा चौधरी कहती हैं, "नेहरू को सिर्फ़ दो लोग भाई कहते थे... एक थे जयप्रकाश नारायण और दूसरे होमी भाभा. हमारे आर्काइव में इंदिरा गांधी का एक भाषण है जिसमें वह कहती हैं कि नेहरू को भाभा अक्सर देर रात में फ़ोन करते थे और नेहरू हमेशा उनसे बात करने के लिए समय निकालते थे. एक अंग्रेज़ वैज्ञानिक थे पैट्रिक बैंकेट जो डीआरडीओ के सलाहकार होते थे... उनका कहना था कि नेहरू को बौद्धिक कंपनी बहुत पसंद थी और होमी भाभा से वह कंपनी उन्हें मिला करती थी."

भाभा का सोचने का दाएरा काफ़ी विस्तृत था. वो वर्तमान के साथ-साथ आने वाले समय की ज़रूरतों को भी उतना ही महत्व देते थे.

आगे की सोच
जाने-माने वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर एमजीके मेनन एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाया करते थे, "एक बार मैं उनके साथ देहरादून गया था. उस समय पंडित नेहरू वहाँ रुके हुए थे. एक बार हम सर्किट हाउस के भवन से निकलकर उसके ड्राइव वे पर चलने लगे. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आप इस ड्राइव वे के दोनों तरफ़ लगे पेड़ों को पहचानते हैं. मैंने कहा इनका नाम स्टरफ़ूलिया अमाटा है."

प्रोफ़ेसर मेनन ने बताया था, "भाभा बोले मैं इसी तरह के पेड़ ट्रॉम्बे के अपने सेंट्रल एवेन्यू में लगाने वाला हूँ. मैंने कहा होमी आपको पता है इन पेड़ों को बड़ा होने में कितना समय लगता है. उन्होंने पूछा कितना? मैंने कहा कम से कम सौ साल. उन्होंने कहा इससे क्या मतलब. हम नहीं रहेंगे. तुम नहीं रहोगे लेकिन वृक्ष तो रहेंगे और आने वाले लोग इन्हें देखेंगे जैसे हम इस सर्किट हाउस में इन पेड़ों को देख रहे हैं. मुझे ये देखकर बहुत अच्छा लगा कि वो आगे के बारे में सोच रहे थे न कि अपने लिए."

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